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स्तुति स्तुति कर मेरे मन
स्तुति में विराजमान है वो
उसके उपकारों को सदा याद करते हुए
गाते रहे मेरे मन
मां की तरह उसने
संबलकार बाहों में लिया
शांति से हम लीन होवेंगे
बाहों में उसके प्रतिदिन
कष्टों के समय में
खरीब सा रहता मित्र वो
घोर शत्रुओं के सामने
मेज को तैयार करता है
भोजोँ से तकने के वक्त
महान बीमारी आने पर बी
अपने चेद्रित हाथो से वो
देता है चंगाई