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तड़प रहा था जमाना
हज़ार बरसो से
मसीहा तेरे लिए
तेरे इस करम के लिए
कि तुने आके हमें
ज़िन्दगी का मूल दिया
हज़ार शुक्र तेरा ऐसी
रौशनी के लिए
कभी ना अपने लिए
ज़िन्दगी का सुख चाहा
सलीबे मौत सही
पापियों के सुख के लिए
चनक रही थी मोहब्बत
लहु की बूंदों से
लहु जो तेरे बदन से
बहा सभो के लिए
करीब तेरे जो आते
नहीं नादान है वो
खुली है बाहें तेरी जब
के हर बशर के लिए