हिन्दी
विश्वास के जीवन की इस नया में
सियों नगर की और जाता हू में
विश्वास के अगुवा येशु को ताकते
विश्राम के देश की और जाता हू में
लहरों नया में उठने पर बी
न कोई बैचेनी मुझे तभी
आंधी और लहरों का सिरजनहारा
आसरा बनकर तू मेरे खरीब
मृत्यु के छाया की तराई में
शरणस्थान बनकर येशु ही संग
दया दर्शाकर हाथों को थामकर
चलाएगा मुझे अंतिम क्षण तक
स्वर्ग में मेरे भवन पोछूंगा जब
आसुवों सारे उस दिन होगा दूर
अंगिनित उसके उपकारों स्मरण कर
चरणों में गिरपदकर वर्णन करू
बेहद परीक्षाओं अधिक दर्दों
जीवन में अविरत आने पर बी
येशु को दिल में स्मरण करते हुए
तक्कान को बुलकर में जाता हू घर