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भेज अबर रूह का
छम छम मेंह बरसा
भेज अबर रूह का
रूह की अग्नि की भट्टी में
झोंक हमें ऐ खुदाया
जैसे पिघल के साफ़ हो चांदी
ऐसा कर खुदाया
हमको भी पिघला
छम…
सूखी बंजर दिलों की भूमि
रूह अपनी से सींचो
रूह-ए-पाक की बूंदे डालो
बीज कलाम का बीजो
मुझे कर दो हरा भरा
छम…
जैसे फ़ौज फरिश्तों की
नबियों के संग रुकता था
अपने रूह की ताकत से
उन नबियों को भरता था
उसी रूह का मज़ा चखा
छम…