हिन्दी
मेरा येशु है मुझको भला
वो ही काफी है सदा-सर्वदा
दुःख में, रोग में, हर मुसीबत में
मेरे मन, वहीं काफी है तुझे
कलवरी के पहाड़ पर चढ़ा
था मुकुट, काँटों का, सिर पर
मेरी वेदना सब दूर करके मुझे
नया जीवन प्रदान कर दिया
वो ही आदि, वो ही अंत है
दिव्य-प्रेम का वहीं स्रोत है
दस हज़ारो में, अति श्रेष्ट है वो
स्तुति-वंदना के योग्य वो
ज़िन्दगी का सफर है कठिन
आते है अवरोध पल-छिन
दिन में मेघ-स्तंभ, रात्रि अग्नि-स्तंभ
बनके राह चलायेगा मुझे
मेरे दुखों का होगा दमन
आँसू पोंछेगा जो आँख होगी नम
राजा बनके जब बादलों पर आयेगा
मैं भी उड़, उसके संग जाऊंगा