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मेरे गुनाह की ली तूने सज़ा
चाबुक की मार से
कुछ ना दिया मैने कुछ ना दिया
बदले में प्यार के
ये क्या किया तूने, क्यूँ ये किया
जान देके तूने ये जीवन दिया
मेरे गुनाह की ली तूने सज़ा...
दर्द था मेरा जो तूने सहा, चढ़ के सलीब पे
कर्ज़ा किया मेरा तूने अदा, काटो और खीलों से
फिर भी ना कम हुआ प्रेम तेरा
जान देके तूने ये जीवन दिया
मेरे गुनाह की ली तूने सज़ा...
मरते हुए माफ़ करते गया, ज़ुल्मों सितम मेरे
मेरे लिए तूने खाईं सदा, दुनिया की ठोकरे
ये क्या किया तूने, क्यूँ ये किया
जान देके तूने ये जीवन दिया
मेरे गुनाह की ली तूने सज़ा...